समय के एकांत स्वरों में मैं जीवन का उल्लास ढूंढता हूं नीरस इस दिनचर्या निपट स्वार्थ में कहां रिश्तों की मिठास ढूंढता हूं खांडू के खेल फागून में वो चांदनी रात में कबड्डी ना कंकड़ चुभते थे ना धूल का था डर वो फागूनढोल कितने मधूकर मगर अब क्या मैं बकवास ढूंढता हूं समय के एकांत स्वरों में जीवन का उल्लास ढूंढता हूं होली पर्व मुबारक हो आप सभी को स के स के साथ